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Hindustan Socialist Republican Association, हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन : Hindlogy

हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन
Hindustan Socialist Republican Association



हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन
Hindustan Socialist Republican Association

  • गठन (Formation) 10 सितंबर 1928 ईस्वी
  • स्थान (Location)   फिरोजशाह कोटला मैदान (दिल्ली)
  • संस्थापक (Founder) चंद्रशेखर आजाद

काकोरी षड्यंत्र कांड के पश्चात हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (Hindustan Socialist Republican Association),
के अघिकतर क्रांतिकारियों को पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया।

कुछ समय पश्चात काकोरी कांड से फरार हुए क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद ने,
10 सितंबर 1928 के दिन दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (Hindustan Socialist Republican Association) की स्थापना की,

जिसमें शिव शर्मा (उत्तरप्रदेश)  , विजय कुमार (उत्तरप्रदेश) , जयदेव कपूर (उत्तरप्रदेश) ,
भगवतीचरण वोहरा (पंजाब ), भगत सिंह (पंजाब ),
सुखदेव (पंजाब ),जैसे क्रांतिकारी शामिल हुए।


हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के कार्य:

सांडर्स की हत्या (17 दिसंबर 1928)-
The assassination of Sanders (17 December 1928) –

अक्टूबर 1928 में लाहौर में साइमन कमीशन के विरोध में निकाले गए जुलूस पर पुलिस अधीक्षक स्कॉट के आदेश पर लाठीचार्ज किया गया,
जिसमें लाला लाजपत राय के सिर पर चोट लगने के कारण उनकी मृत्यु हो गई।

लाला लाजपत राय की इस मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए भगत सिंह, राजगुरु चंद्रशेखर आजाद और जयपाल ने स्कॉट को मारने का षड्यंत्र रचा,

परंतु भूलवश 17 दिसंबर 1928 को लाहौर के रेलवे स्टेशन पर इन्होंने लाहौर के सहायक पुलिस अधीक्षक सांडर्स और उसके रीडर चरण सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी।

सेंट्रल लेजिसलेटिव असेंबली बम कांड (8 अप्रैल 1929 ईस्वी)-
Central Legislative Assembly Bomb Scandal (8 April 1929 AD) –

सांडर्स हत्याकांड के पश्चात हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के क्रांतिकारी भूमिगत (underground) हो गए,

लेकिन इनकी तलाश में पुलिस निर्दोष जनता को परेशान करने लगी,

फलस्वरुप हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के क्रांतिकारियों ने,

अपना अगला महत्वपूर्ण कार्य दिल्ली की सेंट्रल लेजिसलेटिव असेंबली में बम फेंकना तथा गिरफ्तारी देना निर्धारित किया,
ताकि सरकार का ध्यान अपनी ओर केंद्रित किया जा सके.

इस कार्य के लिए भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को चुना गया।

भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल 1929 को जब केंद्रीय विधानसभा में सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक (public safety bill)और व्यापार विवाद विधेयक(trade disputes bill) पर चर्चा चल रही थी,

ठीक उसी समय दो बम और कुछ पर्चे फेंके जिन पर्चों पर लिखा हुआ था कि,
“बहरों को सुनाने के लिए बम की आवश्यकता पड़ती है”,

भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को तुरंत गिरफ्तार कर उन पर मुकदमा चलाया गया।

लाहौर षड्यंत्र मुकदमा 1929-
Lahore Conspiracy Case 1929-

भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त की गिरफ्तारी के पश्चात हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के अन्य क्रांतिकारियों को भी गिरफ्तार किया गया,
तथा सब पर लाहौर षड्यंत्र कांड का मुकदमा चलाया गया।

जेल में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के क्रांतिकारियों ने स्वयं को राजनीतिक बंदियों का दर्जा प्रदान करने के लिए भूख हड़ताल शुरू की,
क्योंकि जेल में राजनीतिक बंदियों को अच्छा खाना, पठन-लेखन सामग्री, अखबार आदि उपलब्ध होते थे,

परंतु साधारण बंदियों को ऐसी कोई भी सुविधा उपलब्ध नहीं थी, 13 सितंबर 1929 को भूख हड़ताल के 64 दिन भूख हड़तालयों में से एक जतिन दास की अनशन करने के कारण मृत्यु हो गई।


भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी :
Bhagat Singh, Sukhdev and Rajguru hanged :

लाहौर षड्यंत्र कांड के मुकदमे के फैसले में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के अधिकांश क्रांतिकारियों को दोषी पाया गया तथा भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी की सजा सुनाई गई,

फलस्वरूप 23 मार्च 1931 को इन तीनों नौजवान क्रांतिकारियों को फांसी की सजा दे दी गई।

फांसी के तख्ते पर खड़े इन तीनों शूरवीर नौजवानों के शब्द थे कि-
“दिल से ना निकलेगी मरकर भी वतन की उल्फत,
    हमारी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आएगी”

Note- फांसी में चढ़ने से पहले भगत सिंह जेल में लेनिन की आत्मकथा पढ़ रहे थे।
भगत सिंह ने जेल में “मैं नास्तिक क्यों हूँ?” नामक शीर्षक से अंग्रेज़ी में एक लेख भी लिखा था।

भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की फांसी की सजा को लेकर जनता में भयंकर रोष था ,

जनता के इस रोष तथा आंदोलन भड़कने के डर से अंग्रेजों ने इन तीनों क्रांतिकारियों के मृत शरीर के टुकड़े कर उन्हें बोरियों में भरकर फिरोजपुर में मिट्टी के तेल से जला दिया ,

परंतु लोगों को आता देख अधजले शरीर को सतलुज नदी में फेंककर भाग खड़े हुए,

जिसके पश्चात देशवासियों ने भगत सिंह,सुखदेव और राजगुरु के मृत शरीर का अंतिम संस्कार किया तथा यह तीनों वीर सदैव के लिए अमर हो गए।

 

Hindustan Republican Association हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन : Hindlogy

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