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विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग/राधाकृष्णन आयोग

विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग/राधाकृष्णन आयोग-

स्वतंत्र भारत का प्रथम शिक्षा आयोग 

आयोग के गठन का उद्देश्य- विश्वविद्यालयी शिक्षा की कमी को दूर करना ,विश्वविद्यालयी शिक्षा का पुनर्गठन करना व इसी के साथ ही शिक्षा को व्यवहारिक, धार्मिक, सांस्कृतिक व मानवीय गुणों के अनुकूल बनाना तथा नैतिकता का विकास करना।


आयोग का गठन –

तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया गया तथा उस कमेटी के सुझाव पर राधाकृष्णन आयोग के गठन को सहमति दी गई।

स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा आयोग राधाकृष्णन आयोग का गठन 4 नवंबर 1948 को किया गया था । जिसके अध्यक्ष राधाकृष्णन थे, इनके नाम पर ही इस आयोग का नाम राधाकृष्णन आयोग पड़ा।

सदस्यों की संख्या – राधाकृष्णन आयोग में 10 सदस्य थे।

सदस्य– डॉ. तारा चंद, सर जेम्स ए. डफ़, डॉ. ज़ाकिर हुसैन, डॉ. आर्थर मॉर्गन, डॉ. ए लक्ष्मणस्वामी मुदालियर, डॉ. मेघनाद साहा, डॉ. कर्म नारायण बहल, डॉ. जॉन जे. टिगेरट, श्री निर्मल कुमार सिद्धांता।

यह स्वतंत्र भारत का पहला शिक्षा आयोग था ।

इसकी नियुक्ति विश्वविद्यालय स्तर की शिक्षा व्यवस्था, संरचना की जाँच करना और तत्कालीन समस्याओं का पता लगाकर सरकार को आवश्यक सझुाव देना था इसलिए इसे विश्वविद्यालय आयोग भी कहा जाता है।

आयोग के सहयोग एवं सुझाव हेतु पूर्व में गठित दो अन्य संस्थाओं को भी शामिल किया गया

1- CABEकेंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड (Central advisory board of education)
-इसका गठन 1920 में किया गया तथा 1935 में पुनर्गठन किया गया।

2- IUBE- अंतर विश्वविद्यालय शिक्षा परिषद् (Inter University Board of education) इसका गठन 1925 में किया गया।


आयोग के जाँच के विषय-

• विश्वविद्यालयों का भलीभांति अध्ययन कर उनकी समस्याओ का पता लगाना ।
• विश्वविद्यालयों के प्रशासन और वित्त के विषय में सुझाव देना ।
• उच्च शिक्षा के लक्ष्यो का निर्धारण करना ।
• उच्च शिक्षा के विषय में अपनी राय एवं आश्यकतानुसार सुझाव देना ।
• उच्च शिक्षा के शिक्षण के स्तर को बढ़ाना ।
• छात्रों के कल्याण हेतू योजनाएं बनाना ।
• छात्रों में अनुशासन को बढ़ाना।
• उच्च शिक्षा से संबंधित शिक्षकों की नियुक्ति, वेतन और सेवा शर्तो के बारे में सुझाव देना।
• विश्वविद्यालय शिक्षा के माध्यम, अवधि और पाठ्यक्रम के विषय में सुझाव प्रस्तुत करना ।


आयोग की रिपोर्ट-

आयोग ने 25 अगस्त 1950 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जो 747 पन्नों पर तैयार की गई थी, 747 पन्नों की इस रिपोर्ट में 15 भाग/अध्याय थे, जिन्हें 1000 विश्वविद्यालयों के पास सुझाव के लिए भेजा गया तथा 600 विश्वविद्यालयों द्वारा तैयार प्रश्नावली के आधार पर बनाया गया था।

आयोग द्वारा दिए गए सुझाव-

आयोग ने अपनी रिपोर्ट में शिक्षा के 13 विषयों पर सुझाव दिए जो निम्नलिखित है-
1-शिक्षा का उद्देश्य
2-पाठ्यक्रम
3-माध्यम तथा शिक्षण प्रणाली
4-धार्मिक और नैतिक शिक्षा
5-उच्च ग्रामीण शिक्षा
6-स्त्री शिक्षा
7-शिक्षक शिक्षा
8-संगठन स्वरूप तथा संरचना
9-प्रशासन और वित्त
10-छात्र कल्याण योजनाएं
11-इंजीनियरिंग तथा तकनीकी शिक्षा
12-विधि/कानून संबंधी शिक्षा
13-चिकित्सा स्वास्थ्य शिक्षा


रिपोर्ट के सकारात्मक पहलू-

1953 में UGC का गठन

शिक्षा के विषय को समवर्ती सूची में डालना (42 संविधान संशोधन 1976 द्वारा)

ग्रामीण विश्वविद्यालय तथा महाविद्यालयों का गठन .

शिक्षक स्तर में सुधार तथा स्त्री शिक्षा में सुधार.

तकनीकी, व्यवसायिक तथा वाणिज्यिक शिक्षा को बढ़ावा -शिक्षा का माध्यम -कल्याणकारी योजनाएं

धार्मिक तथा अनुशासन पद्धति में सुधार


आयोग की आलोचना एवं दोष-

धार्मिक शिक्षा की बाध्यता -वेतन संबंधी असंगतियां -माध्यम के संबंध में अस्पष्टता -स्त्री शिक्षा के संबंध में संकुचित तथा सीमित दृष्टिकोण

ग्रामीण विश्वविद्यालय के संबंध में अपारदर्शिता

उच्च शिक्षा के उद्देश्यों की अस्पष्टता


आयोग का प्रभाव एवं परिणाम-

1953 में विश्वविद्यालय अनुदान समिति को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग में बदल दिया गया।

1954 में ग्रामीण उच्च शिक्षा हेतु समिति का गठन किया गया।

कृषि, वाणिज्य, इंजीनियरिंग कानून एवं चिकित्सा आदि की शिक्षा की व्यवस्था की गई। -विश्वविद्यालय तथा महाविद्यालय में 1949 में NSS तथा 1963 में NCC बनाई गई।

विश्वविद्यालय तथा महाविद्यालय में छात्र कल्याण हेतु ‘एडवाइजरी बोर्ड ऑफ स्टूडेंट वेलफेयर’ की स्थापना। छात्र अधिष्ठातओं (Dean of Students) की नियुक्ति की गई।

स्नातक स्तर पर ट्यूटोरियल प्रणाली लागू की गई, जिससे विद्यार्थियों तथा अध्यापकों के मध्य संबंध स्थापित हो सके तथा विद्यार्थियों के मन से संकोच का भाव दूर हो सके

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